उत्तराखंडी संस्कृति का प्रतीक झुमैलो
प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसी पुण्य वत्सला भूमि उत्तराखंड अनादिकाल से देवगण ,ऋषियों एवं तपस्वियों के लिए निवास स्थल एवं तपोभूमि रही है। उत्तराखंड में प्राचीन काल से ही कथाऐ ,लोक नृत्य ,लोक कलाऐ ,अथवा लोक संगीत ,मनोरंजन के साधन रहे है।
गढ़वाल का प्रागेतिहासिक काल से भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह के जन जीवन में किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण भारत के दर्शन सुलभ है। इस स्वस्थ भावना को जानने के लिए यह के लोक नृत्य पवित्र है। यह के जनवासी अनेक अवसरों पर विविध प्रकार के लोक नृत्य का आनंद उठाते है. जिनमे से लोक प्रिय नृत्य है 'झुमैलो ' यह नृत्य उत्तराखंड के टिहरी जिले का सर्वप्रिय सर्वप्रिय नृत्य है। इसमें एक समहू में मांगलगीत गाती है। और एक बड़े समूह में महिलाये व पुरुष इस मांगल गीत में लींन होकर नृत्य करते है। यहा के जनवासी किसी भी त्यौहार ,पर्व पर हर्षोल्लास के साथ इस नृत्य का लुत्फ़ उठाते है। इस गीत में चार से अधिक स्त्री -पुरुष एकत्र होकर एक दूसरे के कंधो पर हाथ रख कर गोलाई में नृत्य करते है। घेरे के बीच में मुख्य गायक छूणका अन्य कोई वाद्य यंत्र लेकर गीत प्रारम्भ करता है। और गोलाई में घूमते हुए अन्य लोग उसे दोहराते हुए धीमी गति में पैरो को चलते है। इसी नृत्य को झुमैलो कहते है। जिसमे सारे दर्शक झूम जाते है। और भाव विभोर होकर आनंद उठाते है।

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