Wednesday, May 20, 2020

Covid -19 से भिड़ता तीर्थस्थल
चारधाम दर्शन
उत्तराखंड ऐसा राज्य है,जो सौंदर्य का धनी है। किन्तु कोरोना संक्रमण ने उत्तराखंड की १२ हजार करोड से अधिक के कारोबार वाली चारधाम यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया है।
                       इस संक्रमण ने उत्तराखंड की ही नहीं बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया है। लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख की बुकिंग रद्द हो चुकी हैं।
माना जाता हैं कि उत्तराखंड एक ऐसा प्रदेश है, जंहा की अर्थव्यवस्था काफी कुछ इसी यात्रा पर निर्भर करती है।
एक तरफ सरकार की इसी यात्रा से अच्छी खासी आय होती है।
एक धाम यह भी,केदारनाथ
तो वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगो का जीवन भी इसी से होने वाली आय पर निर्भर करता है।
इस बार कोरॉना वायरस के संक्रमण की वजह से सरकार ने चारधाम यात्रा की गाइडलाइंस शुरू की। रद्द की गई बुकिंग की वजह से श्रद्धालु लोग चिंतित ना  हो, अगले दो वर्ष में श्रद्धालु अपनी समय अनुसार चारधाम दर्शन को जा सकते है।
साथ ही उन्हें उसी पर भुगतान करना होगा , जिस पर बुकिंग हुई थी।
कोरोनावायरस महामारी से बचाव के तहत जारी सरकारी परामर्श के अनुसार फिलहाल धार्मिक स्थलों में तीर्थयात्रियों को आने की अनुमति नहीं है। और बद्रीनाथ के कपाट खुलने के दौरान सीमित संख्या में लोग मौजूद रहे।

Wednesday, May 15, 2019

                          मन वांछित फल देती है , माँ कुंजापुरी 


     हिंडोलाखाल नामक स्थान से दांई ओर एक शाखा सड़क पर ४ किमी , घुमावदार पहाड़ी मार्ग तय करने पर ऊँची पर्वत शिखर पर माता कुंजापुरी का भव्य एवं दिव्य मंदिर अवस्थित है।


यह एक मंदिर के अलावा पर्यटक स्थल भी है।  यंहा पर्यटको का एवं भक्तो का आना -जाना लगा रहता है। यंहा लोग दूर -दूर से माता के दर्शन करने  आते है।  एवं लोग अपनी परेशानिया भी माता को व्यक्त करते है।  और माता भी उनकी  परेशानियों को हर लेती है।  एवं माता उनकी हर इच्छाओ को भी पूरा करती है।  यंहा का सबसे रोमांचक दृश्य  , यंहा की ऊँची पहाड़िया एवं मंदिर से दिखने वाली वो हिमालय की सफ़ेद चादर ओडी  चोटिया ,जो सब लोगो का मन मोह लेती है।  और प्रकृति की सुंदरता से पर्यटक दर्शीभूत हो जाते है।
 desh videsh se aaye log

यंहा जो भी भक्त या पर्यटक आते है।  उन्हें यंहा पहाड़ी पर चढ़ाई चढ़कर मंदिर में जाना पड़ता है।  और उन्हें इन पहाड़ियों पर अनेक प्रकार के पेड़ - पौधे ,फल -फूल आदि चीजों से परिचय होता है।  और काफल , बुरांस जैसे स्वादिष्ट फल एवं फूल का लुत्फ़ उठाते है।

एवं ध्यान देने वाली बात तो यह है।  की यंहा ग्रीष्म ऋतू में सर्वाधिक भक्त एवं पर्यटक आते क्योंकि यंहा का मौसम उस ऋतू में सबसे अच्छा रहता है।  परन्तु अगर यंहा का मौसम बारिश में बदल गया तो , यंहा सहित ऋतू का मौसम प्रतीत होने लगता है.. . . . जो वास्तव में सभी लोगो को दर्शभूत क्र लेता है।  
                   उत्तराखंडी संस्कृति  का प्रतीक  झुमैलो 
               
          प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसी पुण्य वत्सला   भूमि उत्तराखंड अनादिकाल से देवगण ,ऋषियों एवं तपस्वियों के लिए निवास स्थल एवं तपोभूमि रही है।  उत्तराखंड में प्राचीन काल से ही कथाऐ  ,लोक नृत्य ,लोक कलाऐ  ,अथवा लोक संगीत ,मनोरंजन के साधन रहे है।  
                                                                                    गढ़वाल का प्रागेतिहासिक काल से भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।  यह के जन जीवन में किसी न किसी रूप में  सम्पूर्ण भारत के दर्शन सुलभ है।  इस स्वस्थ भावना को जानने के लिए यह के लोक नृत्य पवित्र  है।  यह के जनवासी अनेक अवसरों  पर विविध प्रकार के लोक नृत्य का आनंद उठाते है. जिनमे से लोक प्रिय नृत्य है 'झुमैलो ' यह नृत्य उत्तराखंड के टिहरी जिले का सर्वप्रिय सर्वप्रिय नृत्य है। इसमें एक समहू में   मांगलगीत गाती है।  और एक बड़े समूह में महिलाये व पुरुष इस मांगल गीत में लींन  होकर    नृत्य करते है।  यहा के जनवासी किसी भी त्यौहार ,पर्व पर हर्षोल्लास के साथ इस नृत्य का लुत्फ़ उठाते है।  इस गीत में चार से अधिक स्त्री -पुरुष एकत्र होकर एक दूसरे के कंधो पर हाथ रख कर  गोलाई में नृत्य करते है।  घेरे के बीच में मुख्य गायक छूणका  अन्य कोई वाद्य यंत्र लेकर गीत प्रारम्भ करता है।
और गोलाई में घूमते हुए अन्य  लोग उसे दोहराते हुए धीमी गति में पैरो को चलते है।  इसी नृत्य को झुमैलो कहते है। जिसमे सारे दर्शक झूम जाते है। और भाव विभोर  होकर आनंद उठाते है।    

Sunday, May 5, 2019

                                      सौंदर्य का धनी  उत्तराखंड 

   प्रकृति की खूबसूरत वादियों में रची पुण्यवतस्ला भूमि उत्तराखंड प्राचीन काल से ही खूबसूरती में समृद्ध राज्य रहा है।  उत्तराखंड का अधिकांश भाग पहाड़ी है।  जहा हिमालय क्षेत्र वर्ष भर बर्फ से ढाका रहता है।  ऊँची चोटियों से पहले कई स्थानो पर हरे भरे मैदान है। जहा कई भाग पेड़ -पौधे  अथवा कुछ भागो में मखमली घास के मैदान  होते है।  इस को बुग्याल  कहा जाता है।

इस क्षेत्र में छोटी मखमली घास जब देखने में ही मन मोह लेती  है ,तो उस मखमली घास को स्पर्शः करने में कितना दिल चस्प लगेगा ,वाह ;इसी प्रकार हम हिमालय क्षेत्र से थोड़ा नीचे  आते है ,तो यहाँ बुग्याल  की जगह हमको पेड़ - पौधो का दृश्य अच्छा लगने लगता है।  यहाँ जैसे बुरांस ,काफल , देवदार ,बांज आदि के लुभावने पेड़-पौधे मन लुभा लेते है।  और इन पहाड़ियों के बीच बहने वाली नदिया इतने अच्छे  प्रतीत होते है। की पर्यटको  का मन मोह लेते है।

उत्तराखंड एक पर्यटक क्षेत्र है , जहा पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है।  यहाँ के हर जनपद में कही न कही मन मोह लेने वाले पर्यटक स्थल अथवा धार्मिक स्थल है। जहा पर्यटक भारत से नहीं बल्कि अन्य देश विदेशो से भी आते है।  किन्तु प्राकृतिक सम्पदा का धनी उत्तराखंड अभी आर्थिक दृष्टि से कमजोर है।  लेकिन प्राकर्तिक ,सांस्कृतिक ,और धार्मिक दृष्टि से काफी धनी है। हमें इसके सर्वांगीण विकास तथा प्राकृतिक सरक्षण के लिए निरंतर प्रयास जारी रखने होंगे। 

Friday, May 3, 2019

                                     रंग -बिरंगी फूलों  भरी उत्तराखंडी संस्कृति 
    उत्तराखंड  एक पहाडी प्रदेश है। यह एक बहुत ही खूबसूरत और शांत पर्यटक केंद्र एवं धर्मिक स्थल  है।  यह जगह देश के उन चुनिंदा जगहों में शुमार है,  जो अपनी सुंदरता के चलते दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करते  हैं।  यहा  की सुंदरता से आशय यहा की सांस्कृतियों  , परंपराओं  ,रीति  -रिवाजो आदि से है।  साल के शुरुआत में सबसे पहला त्यौहार फूल संक्रांति गढ़वाली में बोला  जाये तो पापड़ी संक्रांत  जो चैत के महीने  मनाया जाता है। इस महीने कन्याये प्रातः काल उठकर बागीचो  से सुन्दर -सुन्दर फूल चुन कर लाती है।  और अपने इष्ट देवताओं को चढ़ा कर ,अपने गांव के सभी परिवारों के देहलिंयो पर डालती है।   

यह कार्य सूर्योदय से पहले किया जाता है। इसी तरह यह गति विधि पुरे एक महीने तक की जाती है। माना जाता है , की इस महीने का सबसे शुभ फूल फ्योली का होता है।  इस प्रकार इस त्यौहार को फूल संक्रांति के नाम से भी  जान सकते है।  एवं इस त्यौहार को ओर आनंदमय  एवं रोमांचक बनाने के लिए घरो में पापड़ी एवं दीवारों पर फूल,फल,जानवरो वृछ आदि साज सज्जा के लिए बनाई जाते   है। इस प्रकार की साज सज्जा को शुभ माना जाता है. इसमें केवल चावल का प्रयोग कियाजाता है।  चावल को एक दिन  पहले से पानी में भिगो देते है। एवं चावल के भीग जाने के बाद ओखली पर कुटा जाता है।  एवं इसका घोल बनाकर दीवारों पर साज सज्जा की जाती है।  इसके साथ साथ हम चावल के घोल को पापड़ी बनाने में इस्तेमाल कर  सकते है. इसी प्रकार हम इसे पापड़ी संक्रांत के रूप में जान या मना सकते है।

यह त्यौहार उत्तराखंड या बोला जाये बच्चो का सबसे पसंदीदा त्यौहार होता है।     

Friday, March 29, 2019

 एप्पण : उत्तराखंडी संस्कृति की एक झलक 

 उत्तराखंड  एक  ऐसा राज्य है। जंहा हमें मनमोहक व्यंजन ,फल ,फूल ,वृक्ष एवं सूंदर पहाड़िया  देखने को मिलती है। बोला जाये तो यह सब हमारी संस्कृति ही है। जंहा संस्कृति में एप्पणं   एक ऐसी संस्कृति है , जो उत्तराखंड की चित्रकला को भी दर्शाता है। पहाड़ो के मकानों में साज सज्जा के लिए दरवाजो , चौखट पर मोर ,कलश ,गणेश  आदि की चित्रकला की जाती है। यहाँ  पर बने घर इतने आकर्षक होते है और  घरो पर की गई साज सज्जा मन मोह  लेती है।  और   पहाड़ो ,पेड़ पौधे ,जैसी चित्रकला भी की जाती है।  जो गढ़वाली भाषा में (एप्पंण  ) कहा  जाता है। और सीधी एवं सरल भाषा में रंगोली कहा  जाता है।  रंगोली अगर हम कहे तो इसे हम किसी भी त्यौहारो में प्रवेश द्वार पर अच्छी सजावट एवं रंग बिरंगे रंगो से  बनाते है।  जिसका अर्थ  समझा जाये तो घर पर आने वाले किसी भी अतिथि का स्वागतम एवं उसकी मंगलकामना करते है।  

Covid - 19 से भिड़ता तीर्थस्थल चारधाम दर्शन उत्तराखंड ऐसा राज्य है,जो सौंदर्य का धनी है। किन्तु कोरोना संक्रमण ने उत्तराखंड की ...